मेरा गुप्त जीवन -42

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प्रिय पाठको, मुझको जो ईमेल मिल रहीं हैं उनमें से कई लोगों ने सोमू के लंड के बारे में कई शंका की है कि कोई भी लंड का हर वक्त खड़ा नहीं रह सकता और इतनी देर तक चुदाई नहीं कर सकता। इसके विषय में काफी कुछ कहा है जैसे कि यह कोरी कल्पना है या मन का फ़ितूर है और इसमें जरा भी सच्चाई नहीं है। आदि आदि…

मेरे बुज़ुर्ग मित्र ने, जिनकी यह आत्मकथा है, मुझे अपने मेडिकल टेस्ट्स Medical Tests की रिपोर्ट्स दिखाई जिनमें उनके परीक्षण एक बड़े अस्पताल के मूत्र रोग विभाग Urology Department में किये गए थे। उन सबकी रिपोर्ट के मुताबिक़ मेरे मित्र को एक रोग हुआ है जिसका नाम है PRIAPISM उनको लक्षण तो उस रोग के हैं लेकिन उनका रोग थोड़ा भिन्नता लिए हुए है क्यूंकि इस रोग के शिकार पुरुष जल्दी ही जीवन में नपुंसक हो जाते हैं जबकि मेरे मित्र की यौन शक्ति अभी भी बरकरार है।

मेरा लौड़ा अभी भी खड़ा था। अब मैंने सोचना शुरू किया कि मेरे लौड़े का इस तरह हर समय और देर तक खड़े रहना शायद आम आदमियों जैसा नहीं है। फिर मैं उन कारणों के बारे में सोचने लगा जिनके कारण ऐसा मेरे लंड के साथ होता था।

मैंने देखा अक्सर जब मैं किसी नौकरानी को देखता था तो मुझे ऐसा लगता था कि यह अपनी चूत मुझको आसानी से दे देगी और किसी ऊंचे घराने की औरत या लड़की को देखता था तो मेरे मन में ऐसा कोई विचार नहीं आता था। शायद यही कारण रहा होगा कि मेरा आकर्षण हमेशा निर्धन औरतों की तरफ ज्यादा रहता था और उनके साथ ही मेरा लंड अपने पूरे जोबन पर रहता था। किसी खूबसूरत लड़की को देख कर मेरे लंड में कभी कोई हरकत नहीं होती थी लेकिन उसके साथ चल रही भरी पूरी नौकरानी को देख कर मेरा लंड हिलोरें मारने लगता था।

इसका मुख्य कारण शायद यह था कि मुझको जन्म से ही नौकरानियों ने ही पाल पोस कर बड़ा किया था और मैं अपनी माँ या और भद्र महिलाओं के पास बहुत कम ही गया था। लेकिन इसका अपवाद था चाची और उसकी बेटी को चोदना और अभी परी और जस्सी के साथ चुदाई।

रही बात मेरे लंड के देर तक खड़े रहने का रहस्य वो तो मेडिकल साइंस ही बता सकती है कि इसका क्या कारण था। कहानी में आगे चल कर जब यह समस्या डॉक्टरों को बताई तो इस पर कई मेडिकल टेस्ट्स हुए जिनके नतीजे के अनुसार यह एक किस्म का रोग होता है जो लाखों में किसी एक को होता देखा गया। इस मीठे रोग के बारे में आगे चल कर काफी चर्चा की जायेगी ताकि मेरे इस अद्भुत रोग का पूरा खुलासा किया जा सके और आपके मन में उठ रही शंकाएं थोड़ी कम की जा सकें।

यह भी आज़माई हुई बात थी कि मैं अपने लंड को काफी देर तक खड़ा रख सकता था या वो एक बार झड़ने के बाद बिना विलम्ब दूसरी या तीसरी बार भी खड़ा हो जाता था। कई कई बार मेरा फव्वारा छूटने के बाद लंड को चूत में ही पड़ा रहने देता था जहाँ वो बिना हिलाये अपने आप खड़ा रहता था और दुबारा चुदाई की हिम्मत रखता था।

मैं अभी भी इसको कुदरत की मेहर मानता था और कभी अहंकार नहीं करता था कि मुझमें कोई ऐसी अद्भुत शक्ति है। लेकिन जो भी लड़की या औरत मेरे निकट आती थी वो मेरे लौड़े की मुरीद हो जाती थी लेकिन वो मेरी तरफ इसलिए भी खिंची चली आती थी क्यूंकि उनके अनुसार मेरा चेहरा और शरीर का गठन बड़ी ही मासूमियत भरा लगता था उन सबको। शक्ल से मैं एक छोटी उम्र वाला लड़का लगता था लेकिन जब मेरे शरीर को देखा जाता था तो वो एक जवान मर्द वाला शरीर लगता था।

मैं समझता हूँ यह भी एक कारण हो सकता है जिसके कारण शादीशुदा औरतें भी मेरी पक्की मुरीद थीं और हर समय मुझसे चुदवाने के लिए तैयार रहती थी। इस विचार को कम्मो, चम्पा, फुलवा और चंचल भी मानती थी।

अब आगे की कहानी…

परी और जस्सी नाश्ता करके अपने घर चली गई क्योंकि वो दोनों बहनों के आने से पहले वहाँ से जाना चाहती थी। उनके जाने के बाद मैं भी कालेज चला गया और आने वाले इलेक्शन में अपना योगदान देता रहा। वापस आते हुए काफी शाम हो गई थी, आते ही मैं अपने बिस्तर पर लेट गया।

कम्मो चाय लेकर आ गई और मैंने पारो को भी बैठा लिया और वो जो साड़ी और ब्रा इत्यादि लाई थी, मुझको दिखाने लगी। मैंने कहा- रात को तुम दोनों इनको पहन कर दिखाना, देखें कैसे लगती हो तुम दोनों इन नए कपड़ों में!

थोड़ी देर बाद पारो आई और बोली- वो चंचल आई है, आपसे बात करना चाहती है। मैं बोला- ले आओ उसको यहाँ ही, वो तो अपनी है न!

जब पारो चंचल को लेकर आई तो देख कर हैरान रह गई कि वो नई डिज़ाइन की साड़ी और हाथ में पर्स लेकर आई। चंचल के इस रूप से कम्मो बड़ी खुश हो रही थी और साथ में पारो भी उसको हैरानी से देख रही थी।

दोनों ने उससे पूछा- वाह चंचल, कमाल कर दिया तुमने, बड़ी सुन्दर साड़ी है, और यह पर्स भी एकदम फस्ट-क्लास है। बड़ी सुन्दर लग रही है चंचल… क्यों छोटे मालिक? मैंने कहा- बहुत सुंदर लग रही हो, बोलो सब घर में कुशल मंगल है न? चंचल मुस्कराते हुए बोली- छोटे मालिक, बस कमाल का जादू किया आपके लंड ने। चूत ने जब बहुत कहा तो मैं आपके पास चली आई! मैं बोला- क्यों पति घर में नहीं है क्या? वो हँसते हुए बोली- वही तो, वो आज सुबह बाहर गए हैं। मैंने सोचा चलो आज छोटे मालिक की सेवा ही कर देते हैं?

मैंने कम्मो की तरफ देखा, उसने मुझको आँख मारी और कहा- हाँ हाँ अच्छा किया, छोटे मालिक बेचारे उदास बैठे थे। तुम आ गई हो तो इनका दिल बहल जाएगा। फिर वो तीनों बातें करती हुई रसोई में चली गई फिर वो चंचल को अपनी कोठरी ले गई।

मैं उठा और बैठक में आकर बैठ गया। थोड़ी देर में गीति और विनी भी आ गई। दोनों का मूड एकदम खराब लग रहा था। पूछने पर गीति ने बताया- हमारा दिल नहीं लग रहा है लखनऊ में, हम वापस जाना चाहती हैं।

मैंने कहा- ऐसी क्या बात हुई कि आप दोनों का मूड उखड़ गया लखनऊ से? गीति बोली- कोई संगी साथी ही नहीं हमारा यहाँ! मैं बोला- क्यों परी है, जस्सी है, दोनों ही तो तुम्हारी सहेलियाँ हैं न?

गीति बोली- हैं तो सही लेकिन वो हमसे ज़्यादा मिक्स नहीं हो पाई। मेरी और विनी की दूसरी सहेलियाँ हैं लेकिन हम उनको नहीं बुलाती यहाँ यही सोच कर कि तुमको शायद अच्छा नहीं लगेगा। मैं बोला- नहीं नहीं, मेरी परवाह न किया करो। जिसको भी बुलाना हो, तुम बुला सकती हो लेकिन कम्मो आंटी को पहले बता दिया करना ताकि वो खाने पीने का इंतज़ाम कर दिया करे।

विनी बोली- सच्ची सोमू भैया, हम बुला सकती हैं क्या किसी भी सहेली को? मैं बोला- हाँ हाँ, बेझिझक बुला लिया करो, जैसे तुमने परी को बुलाया था वैसे ही… और खूब मौज मस्ती करो!

यह सुन कर दोनों ही बहुत खुश हुई और जल्दी से आकर मुझको जफ़्फ़ी डाल दी, बड़ी मुश्किल से दोनों को अपने से अलग किया और वो ख़ुशी ख़ुशी अपने कमरे में चली गई।

मैंने कम्मो को बुलाया और कहा- दोनों बहनें अपनी सहेलियों को बुलाना चाहती हैं क्यूंकि वो काफी बोर हो रहीं हैं, ठीक है न कम्मो? कम्मो बोली- ठीक है छोटे मालिक। मैं बोला- वो तुमको बता दिया करेंगी जब भी कोई सहेली आने वाली होगी ताकि तुम खाने पीने का इंतज़ाम कर दो।

रात को जैसे होना था, हमारी चुदाई का दौर चंचल से शुरू हुआ। कम्मो पहले ही माहवारी की वजह से कुछ रातों के लिए छूट्टी ले गई थी सो हम तीनों ही थे मैदाने जंग में!

चंचल की साड़ी उतारने का हमने एक खेल बनाया, पहले मैंने उसका ब्लाउज उतारा और फिर पारो ने उसकी साड़ी उसके चारों ओर गोल घूम कर उतार दी। फिर मैंने उसकी नई ब्रा को उतारने की कोशिश की लेकिन हम उसमें कामयाब नहीं हुए, उसको कैसे उतारा जाता है, हमें समझ नहीं आ रहा था।

चंचल ने खुद ही अपनी ब्रा खोल दी। फिर उसने बताया कि उसके हुक कहाँ होते हैं और उनको कैसे खोला जाता है। अब पारो को नंगी करने का वक्त था, ब्लाउज चंचल ने उतारा और साड़ी मैंने और फिर पेटीकोट को भी चंचल ने उतारा और इस तरह हम तीनों नंगे थे।

चंचल पारो के मोटे चूतड़ों से बड़ी प्रभावित थी इसलिए वो उसके मोटे और चौड़े चूतड़ों पर हाथ फिरा रही थी। फिर पारो ने कहा कि आज तो चंचल की चूत की खातिर करनी है क्यूंकि बहुत दिनों बाद आई है।

इसलिए उसने चंचल को बिस्तर पर लिटाया और एक उरोज को वो चूसने लगी और दूसरा मेरे मुंह में घुसेड़ दिया। चंचल का एक हाथ मेरे खड़े लंड के साथ खेल रहा था और दूसरा उसने पारो की चूत में डाल रखा था और हम तीनों अपने काम में लगे पड़े थे।

जब चंचल बोली- शुरू करो छोटे मालिक! तो मैंने उसकी टांगों को अपने कंधे के ऊपर रख दिया और एक धक्के में पूरा लंड अंदर कर दिया। उसकी चूत एकदम बहुत गीली हो रही थी, लंड आज़ादी के साथ अंदर बाहर हो रहा था।

फिर मैंने पारो को इशारा किया कि वो भी हमारे साथ लेट जाए और चंचल के मम्मों को चूसे।

अब जब चंचल का छूटने वाला हुआ तो मैंने लंड निकाल कर पारो की मोटी चूत में डाल दिया और चंचल एकदम तड़फने लगी।फिर वो पारो की चुदाई में हमारे साथ हो गई। पारो का वैसे भी बहुत जल्दी छूट जाता था तो चंचल उसकी भग को रगड़ने लगी।

थोड़ी देर में पारो भी कमर उठा कर लंड को बीच में ले रही थी, मैं समझ गया कि पारो का छूटने के नज़दीक पहुँच गया है, मैंने लंड को वहाँ से निकाला और चंचल की नाजुक चूत में डाल दिया। अब पारो सर हिला कर लंड को मांगने लगी।

मैंने कहा- रुको मेरी जान, आज मैं तुम दोनों का छूटने नहीं दूंगा। यह कह कर चंचल की चूत में लंड की रेल गाड़ी चला दी। वो चालाक थी, उसने अपनी टांगों को मेरी कमर के चारों और बाँध दिया और मुझको लंड निकालने का मौका ही नहीं दिया।

जब चंचल छूटी तो उसके शरीर में एक अजीब किस्म की तड़फड़ाहट हुई जो मैंने और पारो ने देखी और उसकी चूत से पानी की एक ज़ोरदार धारा बह निकली। बाद में वो इस कदर ज़ोर से काम्पने लगी कि मैं जो उसके ऊपर था, भी हिलने लगा।

फिर मैंने और पारो ने उसको कस कर पकड़ा तब वो कुछ संयत हुई। पारो बोली- वाह चंचल, क्या छूटी है री तू? कमाल कर दिया तूने तो!

अब मैं पारो के ऊपर फिर चढ़ गया और उसको ऐसे चोदना शुरू किया कि उसको कई बार छूटने के मुकाम पर लाकर फिर उसको छुटने से वंचित कर रहा था। आखिर वो तंग आ गई और उसने मुखे नीचे लिटाया और मेरे ऊपर चढ़ बैठी, वो मुझ को चोदने लगी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़। थोड़ी देर में उसका पानी भी झड़ गया और वो थक कर मेरे ऊपर ही पसर गई।

रात भर हम जागते, चोदते और फिर हम तीनों थक कर सो गए।

सुबह कम्मो ने चंचल से पूछा- क्या हुआ तेरे गर्भ धारण करने का प्लान? कुछ हुआ या नहीं? वो बोली- अभी तो 2 दिन ऊपर हैं, कह नहीं सकती कि है या नहीं। कम्मो बोली- अरे वाह, दाई के होते हुए तुझको काहे का फ़िक्र है री? चल उठ अभी तुझको चैक करती हूँ।

चाय पीने के बाद कम्मो ने मेरे सामने ही चंचल को चेक किया। कम्मो गंभीर मुंह बना कर बोली- चंचल तू कैसी है री, तुझको गर्भ ठहर गया है री! चंचल एकदम चौंक कर बोली- अच्छा दीदी, तुम कैसे कह सकती हो? मुझको तो कुछ महसूस नहीं हो रहा है? कम्मो बोली- अब जा घर अपने… और 15 दिन यहाँ नहीं आना! कच्चे दिनों में चुदवायेगी तो कुछ भी हो सकता है, जा भाग, तुझको गर्भ ठहर गया है। हम सब ख़ुशी से उछल पड़े और चंचल को गले लगा लिया सबने बारी बारी। कहानी जारी रहेगी। [email protected]

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