कड़कती बिजली तपती तड़पती चूत- 5

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जीजा साली का सेक्स कहानी में पढ़ें कि कैसे मैंने बहाने से अपनी साली को मेरी मुठ मारने के लिए तैयार कर लिया. फिर मैंने उसके साथ क्या किया कि वो भी गर्म हो गयी.

”ओ मेरे प्यारे जीजू …” साली जी के मुंह से भी निकला और वो मुझसे अचानक जोर से, पूरी ताकत से लिपट गयी और उसने अपनी कमर को चार पांच बार जोर जोर से उछाला और अपनी चूत मुझसे रगड़ने लगी फिर उसने अपनी टांगें मेरी कमर में लपेट दीं. स्पष्ट था कि वो बिना चुदे ही झड़ रही थी.< अब आगे की जीजा साली का सेक्स कहानी: उसी शाम पांच बजे के करीब मैं भी गुनगुने पानी से अच्छी तरह से नहाया तो ताजगी लगने लगी. फिर अपने लंड को पकड़ कर उसे शाबासी दी 'शाबास मेरे घोड़े वेलडन, बस बेटा थोड़ा इंतज़ार और कर ले. फिर नई चूत मिलेगी तुझे जल्दी ही' मेरे दिमाग से पाप पुण्य अच्छे बुरे का विचार तो गायब ही हो चुका था. दिमाग में अब सिर्फ निष्ठा ही निष्ठा और उसका भरपूर जवान जिस्म ही था कि वो कैसे चुदासी होकर मुझसे लिपट गयी थी और बिना चुदे ही झड़ने लगी थी. अगर सचमुच में मेरा लंड उसकी चूत की चुदाई करता तो वो पता नहीं कैसी कैसी कलाबाजियां दिखाती. ऐसी बातें सोचते हुए मैं अस्पताल जाने के लिए तैयार हो गया. निष्ठा भी तैयार ही थी. शाम के साढ़े पांच बजे हम लोग निकल लिए. निष्ठा के चेहरे पर खामोशी और लाज की लाली थी. जरूर उसे वही सब याद आ रहा होगा जब वो मुझसे अचानक खुद लिपट के झड़ने लगी थी. और शायद खुद को डांट भी रही हो कि उसने मुझसे जोर से लिपट कर ऐसी बेशर्मी क्यों दिखाई. अब जो भी उसके मन में चल रहा हो, पर वो मेरी ओर अब कम ही देख रही थी. छः बजे हम अस्पताल पहुंच गए. शर्मिष्ठा मुझे देखकर बहुत खुश हुई और उसने मेरी तबियत के बारे में पूछा. मैंने भी अपने बेटे को गोद में लेकर खूब पुचकारा और चूमा. मेरी सास बोली- अभी शर्मिष्ठा को बहुत कमजोरी है. डाक्टरनी ने कहा है कि कम से कम तीन चार दिन बाद छुट्टी होगी इसकी. यह सुनकर मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो निष्ठा के साथ तीन चार दिन और अकेले रहने को मिलेगा. अस्पताल से हम लोग रात साढ़े आठ बजे निकल लिए थे. वापिसी में मैं निष्ठा को डिनर के लिए एक बढ़िया रेस्टोरेंट में ले गया. डिनर का मीनू निष्ठा ने ही अपनी पसंद से तय किया था. डिनर के बाद आइसक्रीम खा के हम लोग वापिस घर के लिए चल पड़े. रास्ते में निष्ठा बोली- जीजू, कोई मेडिकल स्टोर दिखे तो आप अपने लिए पेन किलर की टेबलेट्स ले लेना. "क्यों, मुझे क्या हुआ?" मैंने पूछा "अगर रात में आपके पेट में फिर से दर्द हुआ तो दवाई काम आएगी ना!" साली जी बोलीं. "अच्छा, और तू किस मर्ज की दवा है फिर?" मैंने चुटकी ली. "मुझे तो आप रहने ही दो अब, मैं कुछ नहीं करने वाली!" वो तुनक कर बोली. "तो ठीक है फिर, मैं दर्द से चिल्लाता रहूंगा तुम आराम से सोती रहना फिर!" "चलो ये भी ठीक है, मैं तो अपने कानों में रुई डाल के सोऊँगी आराम से!" वो थोड़ा हंस कर बोली. "हां हां सोती रहना ना, घोड़े गधे सब के सब बेच कर सोना, मुझे क्या!" मैंने भी हंसते हुए कह दिया. इन बातों ही बातों में हमारा घर आ गया. मौसम बिगड़ने लगा था बूंदा बांदी शुरू हो चुकी थी. दूर पूरब के क्षितिज पर बिजली रह रह कर कौंध रही थी. डरावने काले काले बादल घिरने लगे थे. घर पहुंच मैंने तो टीवी खोल लिया. शाम के समाचार देखना मेरी रोज की आदत थी. निष्ठा पता नहीं क्या करने लग गयी थी. कुछ देर टीवी देखने के बाद मुझे लगा कि शायद निष्ठा कोई अपना प्रिय सीरियल देखती हो इसलिए मैंने टीवी म्यूट कर दिया और उसे आवाज लगाई. "क्या है जीजू?" वो आते ही बोली. "निष्ठा, मैं तो अब सोने जा रहा हूं, तुम्हें जो देखना हो देखती रहना, गुड नाईट!" मैंने कहा. "ठीक है जीजू, मैं तो अभी सीरियल देखूंगी. आप सो जाओ. गुड नाईट." वो बोली. अपने बेडरूम में जाकर मैं लेट गया. निष्ठा तो गेस्ट रूम में दीवान पर सोती थी. बरसात होने लगी थी और बादल रह रह कर गरजने लगे थे. मैं सोने की कोशिश कर रहा था पर नींद नहीं आ रही थी. निष्ठा के साथ बिताये वो पल रह रह कर याद आ रहे थे. उसका मेरे लंड को पकड़ कर तेल मालिश करना फिर मूठ मारना फिर लंड को अपने पैरों में दबा कर इसे डिस्चार्ज करने की कोशिश करना फिर मेरा उस पर चढ़ जाना और उसकी मुट्ठी चोदना साथ में उसकी चूत को लंड से नॉक करना. और निष्ठा का उत्तेजित होकर झड़ते हुए मुझसे अचानक लिपट जाना. कितना मजेदार और मस्त था वो सब! मेरा दिल तो कर रहा था कि अभी जाकर उसपर चढ़ जाऊं और लंड पेल दूं उसकी चूत में! पर मैं जैसे तैसे खुद सब्र किये हुए था. मैं उसके साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं करना चाहता था. मैं जानता था कि चुदने की चाह तो मैंने निष्ठा के तन मन में जगा ही दी है. और अब आगे जो होगा सो देखते हैं. ऐसे ही सोचते सोचते पता नहीं कितनी रात बीत गयी थी. टाइम देखा तो सवा बारह बज रहे थे. फिर सोचा कि चलो निष्ठा को देख कर आता हूं. अगर जाग रही होगी तो किसी बहाने से बात करके उसे पटाने की कोशिश करूंगा. मन में कुछ प्लान करते हुए मैं दबे कदमों से गेस्ट रूम की तरफ चल दिया. दरवाजे को धीमे से खोलना चाहा तो वो भीतर से बंद मिला तो मैं वापिस लौट आया क्योंकि इतनी रात में नॉक करके निष्ठा को जगाना मुझे उचित नहीं लगा. इस तरह मैं वापिस लौट कर सोने का प्रयास करने लगा. तभी तेज आवाज के साथ जोरदार बरसात शुरू हो गयी. साथ ही आंधी तूफ़ान चलने लगा और बिजली कड़कने लगी. बिजली इतनी तेज आवाज में कड़क रही थी कि मुझे अपने कान बंद करने पड़े साथ ही कुछ डर सा भी लगने लगा था. तभी और तेजी से बिजली कड़की. साथ ही लगा की कहीं आसपास ही गिरी है बिजली! और तुरन्त लाइट चली गयी और पूरे घर में घुप्प अंधेरा छा गया. जब बिजली चमकती तो क्षणभर के लिए चकाचौंध रोशनी हो जाती फिर एकदम से अन्धकार छा जाता. उन दिनों लाइट बहुत कम ही जाती थी तो घर में इन्वर्टर नहीं लगवाया था और रोशनी का कोई दूसरा साधन भी घर में नहीं था. उन दिनों मेरे पास वो नोकिया का एक इंच स्क्रीन वाला बाबा आदम के जमाने का मोबाइल फोन हुआ करता था जिसमें आज के स्मार्ट फोन की तरह फ़्लैशलाइट इत्यादि फीचर्स नहीं होते थे, अतः मैं चुपचाप अपने कान बंद किये लेटा रहा. लगभग एक मिनट बाद ही मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मुझे आवाज दे रहा हो. जब बादलों की गड़गड़ाहट कुछ थमी तो लगा कि निष्ठा मुझे 'जीजू जीजू कहां हो' कह कह के जोर जोर से पुकार रही थी. मैं तुरंत समझ गया कि वो भी तेज बिजली कड़कने से डर गयी है और अंधेरा होने के कारण घबरा रही है. अतः मैं तुरंत उठा और अंधेरे में टटोलता हुआ गेस्ट रूम तक जा पहुंचा. "कौन है ... निष्ठा ... क्या बात है क्या हुआ?" मैंने आवाज लगाई. "जीजू मुझे बहुत डर लग रहा है, लगता है बिजली हमारे घर के पास ही कहीं गिरी है." वो घबराहट भरे स्वर में बोली. "साली जी डरो मत, जस्ट बी ब्रेव यार, कुछ नहीं होगा. अभी थोड़ी देर में मौसम ठीक हो जाएगा, जाओ आराम से सो जाओ." मैंने उसे समझाया. "नहीं जीजू, मुझे अकेले नहीं रहना, आप मेरे साथ ही रहो प्लीज!" वो रिक्वेस्ट करती सी बोली. "चलो ठीक है फिर तुम भी हमारे बेडरूम में चलो. वहीं साथ रहेंगे, ठीक है?" निष्ठा कुछ देर सोचती रही; उसके मन में क्या उथल पुथल चल रही होगी इसका अंदाजा था मुझे. जरूर वो यही सोच रही होगी कि एक ही बेड पर रहने से उसके साथ क्या क्या हो सकता था; पर डर बड़ी चीज है अच्छे अच्छों को लाइन पर ला देती है. "ठीक है जीजू, ले चलो मुझे अपने साथ, यहां तो मैं डर के मारे मर ही जाऊँगी." वो मरी से मद्धम आवाज में बोली. मैंने उस अंधेरे में उसका हाथ पकड़ा और संभल कर चलते हुए अपने बेडरूम में आ गया. निष्ठा मेरे बायीं ओर लेट गयी और मैं कुछ दूरी बना कर दूसरी तरफ लेट गया. रात के ऐसे माहौल में जब जवान कुंवारी साली बिस्तर पर बगल में लेटी हो और घर में हमदोनो के अलावा और कोई न हो! बाहर घनघोर मूसलाधार बरसात हो रही हो और कड़कती बिजली डरा रही हो, घर में घुप्प अंधेरा हो ... चुदाई के लिए यह आदर्श स्थिति थी. जिन लोगों ने बरसात की इन अंधेरी रातों में चुदाई का सुख लूटा है वो मेरी बात को खूब अच्छे से समझ सकेंगे. इस तरह मैं सांस रोके चुपचाप लेटा था पर मेरा पूरा ध्यान निष्ठा के ऊपर ही था. कुछ देर तो वो निश्चल लेटी रही फिर मुझे आभास हुआ कि वो बेचैनी से खुद को यहां वहां खुजला रही है और बार बार करवट बदल रही है. जरूर उसे वो दोपहर वाला वाकया याद आ रहा होगा और उसके पूरे जिस्म में चीटियां सी रेंग रही होंगी. तभी वो यहां वहां खुद को खुजला रही है, हो सकता है वो अपनी चूत भी रगड़ रही हो. स्पष्ट था कि ऐसे माहौल में उसे कतई नींद नहीं आ सकती. मैं तो धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा कर रहा था. मुझे विश्वास था कि जब कामदेव का वो फूलों वाला तीर कमान से निकल कर साली जी को लगेगा तो जो होना है वो स्वयं ही होने लगेगा. तभी बरसात की तेज फुहारें गरज के साथ बेडरूम की खिड़कियों से टकराई और बिजली तड़तड़ा कर कड़क उठी. लग रहा था कि जैसे जल प्रलय आज रात ही आनी है. बादलों की गरज और बिजली की कड़क से निष्ठा फिर डरी और इस बार सीधे मुझसे लिपट गयी. "जीजू, सो गए क्या? बहुत डर लग रहा है मुझे तो!" वो सहमी हुई बोली. मैंने भी तुरंत उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसके सिर पर थपकी देता हुआ उसे किसी छोटे बच्चे की तरह पुचकारने लगा. "क्या यार तुम तो बच्चों की तरह डर रही हो. अरे बरसात का मौसम है तो बादल भी गरजेंगे और बिजली भी चमकेगी; फिर मैं हूं न तेरे साथ!" मैंने उससे कहा और उसकी कमर में हाथ डाल कर उसे अपने बदन से चिपका लिया. निष्ठा के जवान जिस्म की तपिश महसूस करते ही मेरे भीतर वासना की आग और तेजी से भभक कर जल उठी. निष्ठा के दोनों मम्में मेरी छाती से दबे हुए पिस रहे थे और उसका बायां हाथ मेरे कंधे पर था; उसकी गर्म सांसें मुझे अपने गले और चेहरे पर महसूस हो रहीं थीं और उसके दिल की धकधक मुझे अपने सीने पर साफ महसूस हो रही थी. उसके कुंवारे बदन से उठती यौवन की सुगंध मुझे दीवाना बना दे रही थी. ऐसे मौसम ऐसे माहौल में भला किसकी मजाल जो खुद पर काबू रख सके. विश्वामित्र जैसे ऋषि मुनि, बड़े बड़े राजनेता, साधू महात्मा सब के सब अपना तप, अपना मानसम्मान अपनी पद प्रतिष्ठा इस परनारी की चूत के आगे दांव पर लगा कर नतमस्तक हुए हैं. तो मेरे जैसे साधारण इंसान की भला क्या बिसात? मैंने तो पक्का इरादा कर लिया था कि अब निष्ठा की चूत मारनी ही मारनी है चाहे कुछ ही क्यों न करना पड़े. अब किसी भी अंजाम की परवाह मुझे नहीं थी. अतः मैंने अपने तपते होंठ निष्ठा की गर्दन पर रख दिए और चूमने लगा. निष्ठा कसमसाई और मुझे दूर हटाने की चेष्टा करने लगी. पर मैंने उसे और मजबूती से थाम लिया और उसके कान की लौ मुंह में भर के चूसने चुभलाने लगा साथ ही उसके नितम्ब मसलने लगा. "शैतानी मत करो जीजू, ये ठीक नहीं हैं ... मान जाइए प्लीज!" वो कांपती सी आवाज में बोली. पर मैंने उसकी बात अनसुनी करते हुए अपनी मनमानी करता रहा. अब मैंने उसके दोनों गाल बारी बारी से कई कई बार चूम डाले और उसके होंठ चूमते हुए निचला होंठ चूसने लगा साथ ही उसका बायां स्तन कुर्ते के ऊपर से ही धीरे धीरे सहलाने लगा. फिर मैं उसके ऊपर आ गया और उसका निचला होंठ अपने होंठों में दबा कर अच्छी तरह से चूसने लगा. आ रहा है ना मजा जीजा साली का सेक्स कहानी में! कमेंट्स में मुझे बताएं. [email protected] जीजा साली का सेक्स कहानी जारी रहेगी.

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